शिवपुराण से……. (261) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादि की धाराओं से शिवजी की पूजा का माहात्म्य
गंगाजल की धारा तो भोग और मोक्ष दोनो फलों को देने वाली है। ये सब जो-जो धाराएं बतायी गयी हैं, इन सबको मृत्युंजयमंत्र से चढ़ाना चाहिए, उसमें भी उक्त मंत्र का विधानतः दस हजार जप करना चाहिए और ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। (अध्याय 14)
सृष्टि का वर्णन
तदन्तर नारदजी के पूछने पर ब्रह्माजी बोले-मुने! हमें पूर्वोक्त आदेश देकर जब महादेव जी अन्तरध्यान हो गये, तब मैं उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए ध्यानमग्न हो कर्तव्य का विचार करने लगा। उस समय भगवान् शंकर को नमस्कार करके श्रीहरि से ज्ञान पाकर परमानन्द को प्राप्त हो मैंने सृष्टि करने का ही निश्चय किया। तात! भगवान् विष्णु भी वहां सदाशिव को प्रणाम करके मुझे आवश्यक उपदेश दे तत्काल अद्श्य हो गये। वे ब्रह्माण्ड़ से बाहर जाकर भगवान् शिव की कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठ धाम में जा पहुंचे और सदा वहीं रहने लगे। मैंने सृष्टि की इच्छा से भगवान् शिव और विष्णु का स्मरण करके पहले की रचे हुए जल में अपनी अंजलि डालकर जल को ऊपर की ओर उछाला। इससे वहां एक अण्ड प्रकट हुआ, जो चैबीस तत्वों का समूह कहा जाता है। विप्रवर! वह विराट् आकार वाला अण्ड जडरूप ही था। उसमे चेतनता न देखकर मुझे बडा संशय हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। (शेष आगामी अंक में)

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