मृगतृष्णा

वाणी बरठाकुर “विभा”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हमारी जिन्दगी का आधार मृगतृष्णा सी चाहत है, कि कहीं कुछ मिल जाए। ना जाने चाहत की प्यास बुझाने के लिए उम्र के कितने साल गुजार लिए। अगर हमारे अंदर तृष्णा नही होती तो क्या हम जी पाते ? एक तरफ से देखा जाए तो दुनिया ही मरुस्थल है। हम मनुष्य रोज प्रतियोगिता में उतरते हैं, शायद कुछ मिल जाए। जिन्दगी सुधर जाए, जैसे प्यासे मृग के पीछे भटकते हम कुछ कर दिखाने की तृष्णा बुझाने के लिए हमेशा अपना अस्तित्व भूल जाते हैं कि हम कहां खड़े हैं और हम आए कहां से हैं। इसी मृगतृष्णा की वजह से तो हम, हमारे माता-पिता को भी भूल जाते हैं।  बस लगे रहते है कि मुझे और हासिल हो ….।
        उदाहरण के तौर पर आज एक- दूसरे को देखकर लोग कहने लगते हैं कि उनके पास शानदार गाड़ी है, हमें उनसे ज्यादा महंगी गाड़ी लेनी होंगी। उनका बेटा डाक्टरी पढ़ रहा है तो तुम क्यों नही पढ़ पाओगे! अरे उन्होंने दो जगह पर फ्लैट खरीदा है, हमको भी तो खरीदना है। असल में ये सब भी एक किस्म की मृगतृष्णा ही है। हम हमेशा हमारे आस-पास के लोगों को हमसे आगे बढ़ने तथा वो हासिल किया मैं नहीं कर पाया, ये सब सहन नहीं कर पाते हैं, तभी तो जिन्दगी में अशांति महसूस करते हैं। इसी अशांति में शांति को तलाशते हुए ना जाने क्या कुछ कर गुजरते हैं। इसके लिए कभी-कभी खुद के दिलो-दिमाग के साथ-साथ शरीर तक को भी बेच देते हैं। जैसे गर्मी में पानी विहीन जगह पर पानी की तलाश में खुद की जान गवा देते हैं।
          आजकल हम मृगतृष्णा के चक्कर में ज्यादा रहने लगे हैं। माडर्न जमाना है, जीने के लिए आधुनिक चीज़ों का प्रचलन ज्यादा होने लगा है, जिसके जरिए हम सुख नाम की तृष्णा बुझाने के लिए तत्पर रहते हैं। सही मायने में मृग में कस्तूरी की तरह इन सब चीज़ों में सुख है ही नही, सुख तो आत्मसन्तुष्टि में होता है । हम तो बेवजह इधर-उधर घूमकर ढूंढते रहते हैं, जिसके कारण आजकल के बच्चे माता-पिता को नहीं मानते हैं और कही- कही कुछ लोग माता-पिता को बोझ समझकर वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। अगर लोग ऐसे ही तृष्णा में तपते रहे तो खुद को मिटाने के अलावा कोई और चारा नहीं होगा।
तल गेरेकी तेजपुर, शोणितपुर असम

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