सन्यास

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सम्पूर्ण श्रृष्टि को समझने का नाम सन्यास है। जीवन के रहस्य और ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग खोजने का नाम सन्यास है। सन्यासी दो तरह के होते हैं, गृहस्थ और सब कुछ त्यागकर तप करना। इनमें मात्र भाव का फर्क है। दोनों में ही परिस्थित का फर्क नहीं है, मनःस्थित का फर्क जरूर है। जो कोई भी संसार में है, वो सभी सांसारिक माने जायेंगे। चाहे कोई जंगल में, गिरी-कन्दराओं में, पहाड़ पर बैठे हों या गृह में उपस्थित हों। उपाय स्थान बदलने से नहीं, मन को रूपान्तरित करने से सम्भव है।
जो कमजोर हैं, भयभीत हैं, जो संसार को झेलने में असमर्थ हैं, वह परमात्मा को नहीं झेल पायेगा। क्योंकि जो संसार का सामना करने से ही डर रहा है वह परमात्मा का सामना कैसे कर पायेगा। संसार जैसी नष्ट होने वाली चीज़ जिसे डरा देती हो, वह परमात्मा जैसा विराट दिव्य लोक कैसे देख सकता है? उसकी तो आँखे ही बन्द हो जायेंगी। संसार सिर्फ एक प्रशिक्षण केन्द्र है, इसलिये जो प्रशिक्षण-ट्रेनिंग को अधूरा छोड़कर भागता है, वह पूर्णता कैसे प्राप्त करेगा? जीवन जहाँ है, वहीं सन्यासी के सत्कर्म करते हुए जीवन के दायित्वों का निर्वहन करना भी सन्यास है। दायित्वपूर्ण अवस्था या संसारिक विमोह अवस्था अगर संसारिक मोहजाल को छोड़ने को विवश करें,  तब विरक्त होकर ईश्वर की साधना में लीन होना भी उचित माना गया है। मानव जीवन के सत्यनिष्ठा से कर्तव्य पालन करना, जीवन का सबसे बड़ा सन्यास है। उदाहरण- एक बहुत सुन्दर सिने गीत …..संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे!
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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