शिवपुराण से……. (282) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

नारदजी के प्रश्न और ब्रह्माजी के द्वारा उनका उत्तर, सदाशिव से त्रिदेवों की उत्पत्ति तथा ब्रह्माजी से देवता आदि की सृष्टि के पश्चात एक नारी और एक पुरूष का प्राकट्य……………….

गतांक से आगे………..

इस चराचर त्रिभुवन में ये देवता आदि कोई भी तुम्हारा तिरस्कार करने में समर्थ नहीं होंगे। तुम छिपे रूप से प्राणियों के हृदय में प्रवेश करके सदा स्वयं उनके सुख का हेतु बनकर सृष्टि का सनातन कार्य चालू रखो। समस्त प्राणियों का जो मन है, वह तुम्हारे पुष्पमय बाण का सदा अनायास ही अद्भुद् लक्ष्य बन जायेगा और तुम निरन्तर उन्हें मदमत्त किये रहोगे। यह मैंने तुम्हारा कर्म बताया है, जो सृष्टि का प्रवर्तक होगा और तुम्हारे ठीक-ठीक नाम क्या होंगे, इस बात को ये मेरे पुत्र बतायेंगे।
सुरश्रेष्ठ! ऐसा कहकर अपने पुत्रों के मुख की ओर दृष्टिपात करके मैं क्षणभर के लिए अपने कमलमय आसन पर चुपचाप बैठ गया।  (अध्याय 1-2)

कामदेव के नामों का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र-वसिष्ठ मुनि का चन्द्रभाग पर्वत पर उसका तपस्या की विधि बताना……………….

ब्रह्माजी कहते हैं-मुने! तदनन्तर मेरे अभिप्राय को जानने वाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियों ने उस पुरूष का उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतियों ने उसका मुंह देखते ही परोक्ष के भी सारे वृतान्त जानकर उसे रहने के लिए स्थान और पत्नी प्रदान की।

(शेष आगामी अंक में)

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