हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ० अवधेश कुमार अवध

डॉ. ममता बनर्जी “मंजरी”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

उत्तर पदेश राज्य के चंदौली जिले के मैढ़ी नामक गाँव में 15 जनवरी 1974 ईसवी में जन्में एक नन्हा शिशु अवधेश एक दिन सशक्त और सिद्ध कलमकार के रूप में साहित्य जगत में डॉ. अवधेश कुमार ष्अवधष् के नाम से प्रतिष्ठित हो जाएँगे, ऐसा शायद ही कोई सोचा होगा लेकिन पिता स्व.शिवकुमार सिंह और माता श्रीमती अतरवासी देवी का आशीर्वाद और गुरुजनों, बंधु-बांधवों, परिजनों का अपार स्नेह और माँ सरस्वती की असीम कृपा के परिणामस्वरूप आज उनकी गिनती हिंदी के उत्कृष्ट कवियों में होने लगी है। साहित्य-साधना को कर्त्यव्य मानकर नियमित अपनी लेखनी से समाज को नव सन्देश पहुँचाने का क्रम जारी रखते हुए आज आप आत्मविश्वास के साथ निरन्तर अग्रसर हैं। लेखनी कहती हैं-
हर दिल की आवाज बनेगी
अवध लेखनी राज करेगी।।

अवध उपनाम आपके साहित्यिक गुरु स्व० बृजमोहन सैनी जी ने प्रदान किया और ष्अवधष् की लेखनी नियमित समाज के सुप्त वर्ग को जगाने को प्रतिबद्ध हो गई। पँक्तियाँ कहती हैं-
सोने – चाँदी के सिक्कों से,
बोलो क्या भर सकता पेट ?
अब तो जागो मीत हमारे,
अवध सभी को रहा जगाय

साहित्यकार सबके हित की कामना करता है। डॉ० अवधेश कुमार ष्अवध ष् इससे अछूते नहीं रहे और देश की वर्तमान परिस्थिति पर पाठकों को ध्यानाकृष्ट करते हुए आपने एक ओर श्अवधपति आना होगाश् नामक एक धारावाहिक कविता सृजन कर मानवजाति को अवधपति की तरह कर्तव्यपरायण बनने का आह्वान करते हुए अवधपति से गुहार लगाई कि वे संसार में पुनः वापस आएँ और मानव जाति को कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ायें। पँक्तियाँ है-
राम-सिया वनवास अवधि में अलख जगाए ।
लखन भरत हनुमान यथोचित कर्म निभाए ।।
कर्म निभा परिणाम समुन्नत पाना होगा ।
अवध न जाए हार,अवधपति!आना होगा ।।

दूसरी ओर समाज में समरसता उपन्न करने वाली कविताओं को धारावाहिक रूप दिया और अपने इष्ट श्अवधपतिश् को आह्वान करते हुए कहा है कि-
वसुधा पर फैली हो समता स
सबके भीतर हो शुचि ममता ।।
अवधपति! आ जाओ इकबार।

सोशल मीडिया में धारावाहिक कविता खूब लोकप्रिय हुई। आपने मानवजाति को उसकी संकीर्णताओं से निकालकर उन्नति की राह पर लाने के लिए सदैव अपनी लेखनी चलाई और सर्वत्र कल्याण की कामना किया। बात सिर्फ इन लम्बी धारावाहिक कविताओं की नहीं बल्कि छोटी-छोटी कविताओं में भी आपकी कवित्व प्रतिभा परिलक्षित है।
सोच सको तो सोचो, पत्थर और मनुष्य, राम जी का वास, शपथ पत्र, प्रकृति और हम, जिंदगी, किंतु हमारे लब हैं मौन, करो न सवाल, पायल बनाम चंदन, विरह व्यथा कथा, सिर्फ बहिष्कार नहीं, आविष्कार करो, हे मनमोहन, कागज की नौका, आते-जाते, सूर्य पुकार सुनो, गुरु, सावन क्यों होता मनभावन, विनती, श्रम, आखिर कब तक, बाबा, काशी, ईद-मुबारक, सब कुछ अब है गोल-मटोल, मैं दीन-हीन लघुदीप एक, जाग भी जाओ, श्री हनुमान जन्मोत्सव, जिंदगी का सफर, श्री रामोद्भव, नववर्ष मंगलमय हो, भगत की देशभक्ति, ए साकी, सा रा रा दिल बोल उठा, संकल्प, सुरक्षा, शिव-स्तुति, मैं लिख न सका, वीर भगत सिंह, कितना बदल गया परिवेश, प्रेम पगे प्रश्न, प्राची, जीवन सफल बनाएगा, इमारत और झोपड़ी, वे छुरी चलाते हैं हँसकर, जब साल चुनावी आता है, बाबा नागार्जुन, सखे, पावस, सुन रे संजय, पिंजरे, बेबुनियाद इल्जाम, टूटे पत्ते, समय का चक्र, माँ, कर्मवीर के चरण चूम लें, बाँसुरी, तिमिर, बलात्कारी भी हो सकता है मानव बम, आज शाम को आ जाना, करवा चैथ, विजया दशमी, सेनानी की वापसी, साथी, राम, राम न होते, कोरोना बनाम मधुशाला, कोरोना आदि सैकड़ो छोटी-बड़ी कविताएँ, गीतिका और मुक्तकमाला पाठकों के दिल को छूने में कामयाबी हासिल की और इसलिए कर पाई क्योंकि कविताएँ यथार्थ जगत के विस्तृत क्षेत्र को छूती है।
कविताओं में देशप्रेम, राष्ट्रीयता भावना, प्रकृति चित्रण, सामाजिक और साहित्यिक दशा-दिशा, कटु और मधुर अनुभव और ईश-भक्ति का समन्वय है। छंदबद्ध कविता हो या मुक्त छंद कविता, गीत हो या गजल हर विधाओं में आपकी लेखनी समान लय से चलती है। सिर्फ इतना ही नहीं सम्पादक,समीक्षक और निबन्ध लेखक के रूप में भी आपने अपनी परचम लहराई। आपने कई काव्य साझा-संग्रह एवं पत्रिकाओं के कुछ आंशिक सम्पादन किया, साथ ही लगभग तीन दर्जन काव्य एवं गद्य पुस्तकों की शानदार समीक्षा की। समसामयिक निबन्ध लेखन के क्षेत्र में भी आपका योगदान उल्लेखनीय है।
कहा जाता है कि पूत के पाँव पालने में ही दीख जाता है। डा. अवधेश कुमार अवध के लिए लोकोक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है। बाल्यकाल से ही हिंदी भाषा के प्रति आपका गहरा प्रेम था और लेखन के क्षेत्र में भी विशेष अभिरुचि थी। यह बनारस की मिट्टी का देन भी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी लेकिन असामयिक पिता की मृत्यु और उसके बाद स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई की व्यस्तता के कारण लम्बे समय तक आपकी लेखनी लगभग थमी सी रही। इसी बीच श्रीमती रीमा देवी के साथ आप विवाह बंधन में बंधे। सांसारिक जीवन में प्रवेश करने के बाद आपने पत्रकारिता में डिप्लोमा करने की ठानी और अपनी मेहनत और लगन के बल पर शीघ्र ही एक शिक्षण-संस्थान में योगदान देने के साथ-साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल कर लिया। इसी बीच आपको एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पति और पिता का गुरुतर उत्तरदायित्व निभाते हुए आपने शिक्षण कार्य व पत्रकारिता को साथ-साथ कायम रखा। फलतः लेखनी को नयी दिशा मिली, लेकिन समय के साथ पत्रकारिता की लय धीमी पड़ी और लेखनी सिर्फ और सिर्फ पठन-पाठन हेतु ही इस्तेमाल होने लगी। इसके बावजूद भी जब कभी अवसर मिलता, विद्यार्थियों को हिंदी भाषा व साहित्य की महत्ता व इसके विविध पहलुओं से अवगत कराते न चूकते। कई विद्यार्थी हिंदी के विविध विषयों पर शोधपत्र लिखने के क्रम में आपकी मदद लेते, लेकिन समय चक्र बदलने के साथ आपका कर्मक्षेत्र मेघालय बना और आप एक अभियन्ता के रूप में बनारस छोड़कर मेघालय में आ बसे।
मेघालय जैसे हिन्दीत्तर क्षेत्र में आकर हिंदी को आगे बढ़ाने का संकल्प पहले से कहीं अधिक दृढ़ हुआ और आपने पुनः अपने हाथ में लेखनी थाम ली। वर्षों बीत गए। अपनी कर्मक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के साथ अनवरत अपनी लेखनी को चलायमान रखने में आपने सफलता हासिल की और सोशल मीडिया से जुड़कर अपने लक्ष्य की ओर चल पड़े। नूतन साहित्य कुंज नामक साहित्यिक समूह का संस्थापन करना और इसे नियमित चलायमान रखना आप का ही देन है।
साहित्य के क्षेत्र में आपके उल्लेखनीय योगदान के कारण आप सन 2018 में विद्यावाचस्पति (मानद डॉक्टरेट) की उपाधि से नवाजें गए और साथ ही दर्जनों साहित्यिक सम्मान आपकी झोली में आई। देश-विदेश के विविध पत्र-पत्रिकाओं में नियमित आपकी रचनाएँ प्रकाशित होना एवं दूरदर्शन व आकाशवाणी में आपकी रचनाओं का प्रसारण होना आपके काबिलियत का परिचायक है। आप निरन्तर आगे बढ़ें और साहित्य के महाकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र की भाँति चमकें।

साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्त्री (गिरिडीह) झारखण्ड

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